धीरे धीरे से भाग --- 11
दीप्ती वहाँ से तो चली आई थी पर उसकी आँखो से आँसू थे की रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे इतना बड़ा झूठ वीर से बोलकर मुझे अच्छा नहीं लग रहा था पर वो भी क्या करती लाख चाहने के बाद भी उसे उसके लिए वो फिलिंग नहीं आ रही थी जो एक लड़की को अपने होने वाले पति के लिए महसूस करनी चाहिए ,,,,,
उसके दिमाग़ मे तो लड़को की एक अलग ही छवि थी लड़का कोई भी हो लड़की का फायदा ही उठता है अपना काम हो तो इतनी मिठास उसकी की जुबान मे भरी होती है की उसके आगे चाशनी भी फीकी पड़ जाती है प्यार का झूठा दिखावा करते है एक से दिल नहीं भरता भवरे की तरफ हर फूल पर उन्हें तो बस मंडाराना होता है,,,,,,
लड़कियों से हँसी मज़ाक करना बुरा नहीं है ना ही उनके साथ दोस्ती करना,,,,, पर अगर एक मर्यादा मे हो तो अच्छी लगती है,,, दोस्ती को प्यार मे बदलना गलत नहीं है कई बार ऐसा होता है पहले अच्छी दोस्त होते फिर दोनों को अपने अंदर पनप रहे प्यार का एहसास होता की वो दोनों एक दूसरे के लिए ही बने है तब वो दोनों अपनी ज़िन्दगी को एक साथ गुजरने का फैसला करते है,,,,,,
प्यार दिल की गहराईयों से किया जाता है ना की दिमाग़ से प्यार की एक बून्द ज़ब दिल को छुती है तो उसकी आँखो मे इसका अहसास साफ साफ देखा जा सकता है,,,,,,,
उसे ऐसे ही प्यार की तलाश थी उसके दिल मे प्यार का एक अलग ही मुकाम था दीप्ती कहती थी की प्यार को दिखाने की जरुरत नहीं होती ये तो वो एहसास है जो खुद ब खुद महसूस हो जाता है जो प्यार दिखाया जाए वो प्यार नहीं होता खुद को बहलाने का एक मीठा सा एहसास होता है बस ,,,,,,,
वीर उसकी बहुत केयर करता था उसे अच्छे से समझता था दीप्ती का हर हाल मे साथ देता था दीप्ती को कभी कमजोर नहीं होने देता था ज़ब भी दीप्ती कही ढगमगाती तो वीर अपने प्यार के एहसास से उसे बहुत स्पॉट करता है दीप्ती का दिल इस एहसास से भर उठता था दीप्ती को अपनी किस्मत पर नाज होता था पर कभी कभी उसे ये भी एहसास होता की ये सब फेक है ज़ब भी वो उसकी आँखो मे देखती तो उसे उसकी नज़रो मे वो प्यार नज़र ही नहीं आता था वीर की आँखे और उसके शब्दों के बीच मे कोई तालमेल नहीं होता था,,,,,
दीप्ती का दिमाग़ वीर के प्यार की गवाही देता तो वही उसका दिल उस को जुटलाता था इन सब के बीच वो पिसती जा रही थी तब कही जाकर दीप्ती इस नतीजे पर पहुंची की इस बात को यही खत्म किया जाए इस रिश्ते का कोई भविष्य नहीं है जिस बात की गवाही दिल ना दे वो काम नहीं करना चाहिए पर उसकी ये समस्या थी की वो अपने दिल का हाल किस को बताए किस से कहे की उसके दिल मे किस तरह की उधेड़बुन चल रही है उसकी सुनने वाला ही कौन है इस लिए उसने ये तरीका निकला की वीर से ही बात की जाए शायद वो ही अब कुछ कर सकता है किसी और से तो अब उसे उम्मीद नहीं है,,,,,,,
वीर से मिल कर दीप्ती अपने कमरे मे जा कर बिस्तर पर गिर पड़ी रोते रोते कब उसकी आँख लग गयी उसे पता ही नहीं चला,,,,,
सुबह ज़ब वो उठी तो वीर जा चूका था ये देख कर दीप्ती ने राहत की साँस की,,,,,
कुछ दिनों तक वीर के घर से कोई खबर नहीं आई ना ही वीर ही उनके घर आया दीप्ती को लगा की अब शायद सब ठीक हो गया है वीर ने इतना सब सुनने के बाद अब उसने अपने दिल मे से उसका ख्याल ही निकल दिया होगा ,,,,,,
फिर से दीप्ती अब दीप्ती बन गयी थी वो पहले की तरह हँसती सब से मस्ती करती,,,,,,,
पर कहते है ना बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी ज़िन्दगी और दीप्ती की किस्मत दोनों ही इस कदर आपस मे भिड़ रही थी दोनों ही जीतने के लिए साम दाम दंड भेद सब को अपना रही थी एक पॉइंट नहीं छोड़ रही थी दोनों,,,
दीप्ती भी कभी कभी सोचती की ये क्या है भाई लाइफ मे इतने सियापे मेरे ही ज़िन्दगी मे,,,,
भगवान से बोली क्यों भाई अपने सारे कैमरे मुझ पर ही लगाए हो क्या ये सब आप मेरे साथ अनजाने मे करते हो या कोई पर्शनल दुश्मनी निकली जा रही है मुझसे,,,,
इस बार दीप्ती के घर वीर तो नहीं पर वीर के माँ पापा आए हुए थे,,,, ज़ब दीप्ती कॉलेज से घर आई तो उन लोगो को अपने घर मे देख कर उसके मन मे आया कही ये लोग शादी के लिए मना करने तो नहीं आए,,,,,
पर उनकी बातो से ये तो बिलकुल ही नहीं लग रहा था की वो लोग ऐसा करने के लिए आए है यहाँ,,,,,
दोनों ही परिवार के लोग और उनके साथ नरेश अंकल भी आए हुए थे सभी के चेहरे ख़ुशी से चमक रहे थे अगर उन लोगो को वीर ने भेजा होता तो ये लोग ऐसे हँस हँस के तो बाते नहीं कर रहे होते,,,,
मम्मी और पापा के चेहरे पर उदासी होती ना की ख़ुशी उसे सोच सोच कर ही बहुत घबराहट हो रही थी आखिर ये लोग यहाँ क्यों आए हुए है,,,,,
वीर कभी जान पायेगा दीप्ती की सचाई को,,,, वीर के माता पिता किस लिए आए थे, दीप्ती के घर,, क्या सब जान कर अनजान बन रहे थे या उन्हें वीर और दीप्ती के बीच की बातो की भनक भी नहीं थी इन जभी सवालों के जवाब के लिए जुड़े रहे मेरे साथ,,,,
जारी